Published on: May 28, 2025
एक ऐसा भारतीय डिफेंस प्रोजेक्ट, जो दशकों तक फाइलों में दबा रहा। एक ऐसा इंजन, जिसे लेकर वैज्ञानिकों ने पसीना बहाया लेकिन सफलता दूर रही। अब अचानक यह प्रोजेक्ट फिर से ज़ोर पकड़ रहा है। आखिर क्यों? क्या इसका सीधा जुड़ाव दुनिया के सबसे ताकतवर फाइटर जेट राफेल से है? क्या भारत अब अपने दम पर लड़ाकू विमान के लिए इंजन बना सकेगा? इन तमाम सवालों के जवाब छुपे हैं कावेरी इंजन की कहानी में – एक अधूरी कोशिश, जो अब मुकाम की ओर बढ़ रही है।
भारत की एयरोस्पेस क्रांति का बीज: कावेरी इंजन
1990 के दशक में जब भारत अपने पहले हल्के लड़ाकू विमान (LCA) ‘तेजस’ पर काम कर रहा था, तभी एक महत्वाकांक्षी सपना देखा गया – एक स्वदेशी जेट इंजन बनाने का सपना। यह सिर्फ एक मशीन नहीं थी, यह भारत के रक्षा आत्मनिर्भरता की नींव थी। इस सपने का नाम रखा गया — कावेरी इंजन प्रोजेक्ट।
ये इंजन इन विमानों को ध्वनि से भी तेज गति, हवा में गजब की गुलाटी और करतब दिखाने की क्षमता प्रदान करते हैं. भारत लंबे समय से अपना ऐसा ही एक स्वदेशी इंजन बनाने की कोशिश कर रहा है. इसी प्रोजेक्ट का नाम है कावेरी इंजन प्रोजेक्ट।
गैस टरबाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE), DRDO के तहत, इस प्रोजेक्ट की बागडोर संभाली गई। लेकिन रास्ता आसान नहीं था। तकनीकी अनुभव की कमी, निरंतर असफल परीक्षण, और थ्रस्ट पावर में खामियां – इन सबने मिलकर कावेरी को तेजस के लिए अनुपयुक्त बना दिया। इसे अमेरिका से लाए गए GE-F404 इंजन से बदलना पड़ा।
आज, जब भारत ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है, वही पुराना इंजन एक नए अवतार में वापस आ रहा है। इस बार सिर्फ GTRE ही नहीं, बल्कि फ्रांस की नामी एयरोस्पेस कंपनी Safran भी इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी दिखा रही है। सूत्रों की मानें, तो भारत और फ्रांस के बीच कावेरी इंजन को आधुनिक बनाने और फाइटर-जेट ग्रेड तक पहुंचाने को लेकर तकनीकी सहयोग की बातचीत चल रही है।

राफेल से संबंध: क्या यह केवल संयोग है?
अब बात आती है राफेल की — फ्रांस का वही अत्याधुनिक फाइटर जेट, जिसने भारत की वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ा दी है। राफेल में Safran द्वारा निर्मित M88 इंजन का उपयोग होता है। अब Safran और भारत अगर कावेरी को अपग्रेड कर रहे हैं, तो यह महज़ तकनीकी सहायता नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोग है।
संभावना है कि M88 इंजन की टेक्नोलॉजी का कुछ हिस्सा कावेरी में इस्तेमाल हो सकता है। यह भविष्य में राफेल जैसे विमानों या उनके अपग्रेडेड वर्जनों में स्वदेशी इंजन लगाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा।
वर्तमान में कावेरी इंजन की थ्रस्ट क्षमता लड़ाकू विमानों के लिए थोड़ी कम है, लेकिन इसके बेसिक मॉडल्स को UCAVs (जैसे ग़ातक स्टील्थ ड्रोन), ट्रेनर जेट्स और मीडियम रेंज के एयरक्राफ्ट्स में इस्तेमाल करने की दिशा में काम हो रहा है। DRDO और GTRE अब इंजन की ‘dry thrust’ और ‘afterburner’ क्षमताओं पर विशेष रूप से फोकस कर रहे हैं।
आने वाले कल का इंजन?
अगर Safran और भारत का यह सहयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में कावेरी इंजन न सिर्फ भारत के मौजूदा जेट्स में, बल्कि अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों जैसे AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) में भी उपयोग किया जा सकता है।
यह न सिर्फ विदेशी निर्भरता को खत्म करेगा, बल्कि भारत को इंजन निर्माण की वैश्विक रेस में भी एक सशक्त दावेदार बना सकता है।
निष्कर्ष:
कावेरी इंजन कभी विफलता की मिसाल समझा जाता था। लेकिन अब यही प्रोजेक्ट भारत की तकनीकी और सामरिक ताकत का प्रतीक बन सकता है। राफेल और कावेरी के बीच आज जो धागा जुड़ रहा है, वह भविष्य में आत्मनिर्भर भारत के सबसे मजबूत पंखों में बदल सकता है। सवाल अब यह नहीं कि क्या कावेरी उड़ान भरेगा, सवाल यह है — कब?