Published on: July 7, 2025
भोजपुरी अभिनेता और बीजेपी नेता दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर छिड़े विवाद पर आग उगलते हुए चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि वे मराठी नहीं बोलते और अगर किसी में हिम्मत है तो उन्हें राज्य से बाहर निकालकर दिखाए। यह बयान उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच 20 साल बाद हुए सुलह के बाद तेज हुए भाषाई विवाद के बीच आया है। एमएनएस कार्यकर्ताओं द्वारा हिंदी भाषियों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं के बाद निरहुआ ने इसे "गंदी राजनीति" बताया और भारत की बहुभाषी संस्कृति पर ज़ोर दिया।
भाषा पर राजनीति: क्या मराठी बोलना अनिवार्य है?
महाराष्ट्र में भाषा को लेकर उठा विवाद अब धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनता जा रहा है। हाल ही में मीरा रोड में एक रेस्टोरेंट मालिक को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह मराठी में बात नहीं कर रहा था। मनसे के कार्यकर्ताओं द्वारा हमला करने का वीडियो वायरल हुआ और पूरे देश में आलोचना शुरू हो गई। इसी संदर्भ में निरहुआ ने एएनआई से बातचीत में कहा कि, "जो लोग ऐसी गंदी राजनीति करते हैं, वे देश की एकता और विविधता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारत कई भाषाओं और संस्कृतियों का देश है और यह उसकी सबसे बड़ी ताकत है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर कोई व्यक्ति पांच भाषाएं बोलना चाहता है तो यह उसकी व्यक्तिगत आज़ादी होनी चाहिए, कोई ज़बरदस्ती नहीं। निरहुआ के इस बयान ने हिंदी भाषियों के बीच एक साहसिक आवाज़ के रूप में जगह बना ली है, वहीं मराठी अस्मिता की बात करने वाले गुटों में नाराज़गी देखी जा रही है। यह बयान न केवल एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है बल्कि एक राष्ट्रीय बहस की शुरुआत भी करता है कि क्या किसी राज्य में भाषा थोपना उचित है?

राजनीति, अस्मिता और लोकतंत्र का टकराव
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच लंबे समय बाद हुआ मेल-जोल एक ओर जहां शिवसेना की ताकत को फिर से संजोने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर मराठी अस्मिता को लेकर पुराने तेवर फिर से दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में जब निरहुआ जैसे लोकप्रिय अभिनेता और सांसद इस बहस में खुलकर उतरते हैं, तो यह केवल एक बयान नहीं रह जाता — यह संविधानिक मूल्यों, भाषा की स्वतंत्रता और भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। निरहुआ ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि राजनीति का उद्देश्य लोगों के अधिकारों की रक्षा होना चाहिए, न कि उन्हें डराना या सीमित करना। उन्होंने कहा, "अगर हिम्मत है तो निकालकर दिखाओ" — यह केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि उन ताकतों को आईना है जो भाषा के नाम पर भेदभाव फैलाना चाहते हैं। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर गया, और #StandWithNirahua और #LanguageFreedom जैसे हैशटैग से लोग अपनी राय रख रहे हैं।
यह स्पष्ट हो गया है कि देश अब सांस्कृतिक विविधता को लेकर ज्यादा सजग है और किसी भी प्रकार की राजनीतिक ज़बरदस्ती को लेकर अब आंखें मूंदे नहीं रहेगा।
संविधान की भावना और भाषाई सहिष्णुता का सवाल
भारत का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति और भाषा की स्वतंत्रता देता है। कोई व्यक्ति चाहे जहां भी रह रहा हो, उसे अपनी मातृभाषा, पसंदीदा भाषा या क्षेत्रीय भाषा में बोलने का अधिकार है। ऐसे में मराठी भाषा को अनिवार्य बनाने या उसके सम्मान के नाम पर किसी और भाषा को दबाने की कोशिश करना सीधा-सीधा संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। निरहुआ का बयान इसीलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वो एक ऐसे तबके की आवाज़ हैं जो प्रायः राजनीतिक रूप से नजरअंदाज कर दिया जाता है — प्रवासी, मेहनतकश और गैर-मराठी भाषी। उन्होंने बताया कि वो न सिर्फ एक अभिनेता हैं, बल्कि एक सांसद भी हैं, और राजनीति का उद्देश्य लोगों की भलाई होना चाहिए, न कि डर का माहौल बनाना। उनके बयान ने एक ज़रूरी चर्चा शुरू की है कि भारत में क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय एकता में कैसे संतुलन बनाया जाए। आज ज़रूरत है भाषाई सहिष्णुता, आपसी सम्मान और संविधान की भावना को समझने की — क्योंकि हमारी विविधता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है, और उस पर किसी भी प्रकार की राजनीति निरर्थक और खतरनाक है।