क्या है रोमियो-जूलियट कानून, जिस पर SC ने पॉक्सो को लेकर केंद्र को दिया बड़ा सुझाव

Published on: January 10, 2026

क्या है रोमियो-जूलियट कानून

भारत के सबसे सख्त कानूनों में गिने जाने वाले पॉक्सो एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। अदालत ने माना कि मासूम किशोर रिश्तों को अपराध की श्रेणी में डालकर समाज अनजाने में भविष्य बर्बाद कर रहा है। इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ लाने का सुझाव दिया है, ताकि आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों और वास्तविक यौन अपराधों के बीच स्पष्ट फर्क किया जा सके। सवाल बड़ा है—क्या अब कानून बदलेगा?

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और नई दिशा

सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को एक अहम सुझाव दिया है—कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ा जाए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट कहा कि पॉक्सो जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल कई मामलों में सुरक्षा से ज़्यादा सज़ा का औज़ार बनता जा रहा है। अदालत ने माना कि देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे केस सामने आ रहे हैं, जहां किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों को भी यौन अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है। इससे न केवल न्यायिक संसाधनों पर बोझ बढ़ता है, बल्कि युवाओं का भविष्य भी अनजाने में अंधेरे में धकेल दिया जाता है। कोर्ट का मानना है कि कानून का उद्देश्य संरक्षण होना चाहिए, प्रतिशोध नहीं। इसी सोच के तहत रोमियो-जूलियट क्लॉज की अवधारणा सामने आई है।


केस की पृष्ठभूमि और इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ा पहलू

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी उस समय आई जब उत्तर प्रदेश सरकार एक मामले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंची। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी को जमानत दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क से असहमति जताई, लेकिन जमानत को बरकरार रखा। इसी दौरान कोर्ट ने व्यापक संदर्भ में पॉक्सो के इस्तेमाल पर सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि हर मामला एक जैसा नहीं होता, फिर भी कानून की धाराएं सभी पर समान रूप से लागू हो जाती हैं। इससे कई बार ऐसे किशोर भी अपराधी बना दिए जाते हैं, जिनका इरादा शोषण नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव होता है। यह टिप्पणी किसी एक केस तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे सिस्टम पर पुनर्विचार की दस्तक बन गई।

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रोमियो-जूलियट क्लॉज क्या है और क्यों जरूरी बताया जा रहा है

रोमियो-जूलियट क्लॉज का मूल विचार यह है कि यदि दो नाबालिग या उम्र में बहुत कम अंतर वाले किशोर आपसी सहमति से रिश्ते में हैं, तो उन्हें पॉक्सो की कठोर धाराओं से स्वचालित रूप से अपराधी न माना जाए। वर्तमान कानून में सहमति का कोई महत्व नहीं है। इसी कारण 17 वर्षीय लड़की और 18 वर्षीय लड़के के बीच संबंध भी गंभीर यौन अपराध बन जाता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सामाजिक विरोध, पारिवारिक नाराजगी या बदले की भावना कानून को हथियार बना लेती है। रोमियो-जूलियट क्लॉज का उद्देश्य यही पहचानना होगा कि कौन सा मामला वास्तविक शोषण है और कौन भावनात्मक नासमझी। इससे न्याय अधिक मानवीय और संतुलित बन सकेगा।


दुरुपयोग पर रोक और जवाबदेही की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने केवल छूट की बात नहीं की, बल्कि जवाबदेही की भी बात उठाई। अदालत ने कहा कि ऐसा सिस्टम विकसित होना चाहिए, जिससे जानबूझकर झूठे केस दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई हो सके। कोर्ट के अनुसार, कई मामलों में पॉक्सो का इस्तेमाल प्रेम संबंध तोड़ने, सामाजिक दबाव बनाने या निजी दुश्मनी निकालने के लिए किया जाता है। इससे असली पीड़ितों के मामले भी कमजोर पड़ते हैं। इसलिए कानून में ऐसा तंत्र जरूरी है, जो प्रारंभिक स्तर पर ही यह जांच सके कि मामला संरक्षण का है या प्रतिशोध का। कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति विधि सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि इस दिशा में ठोस पहल हो सके।


कानूनी सुधार बनाम सामाजिक वास्तविकता

भारत में किशोरावस्था एक संवेदनशील चरण है, जहां भावनाएं तेज़ होती हैं और समझ अधूरी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार करती है। अदालत ने इशारों में कहा कि कानून को समाज से कटकर नहीं, समाज के साथ चलना चाहिए। यदि हर किशोर प्रेम कहानी को अपराध बना दिया जाएगा, तो जेलें भरेंगी, पर न्याय अधूरा रहेगा। रोमियो-जूलियट क्लॉज का प्रस्ताव इसी संतुलन की खोज है—जहां असली अपराधियों पर सख्ती बनी रहे, लेकिन मासूम रिश्ते कानून की चक्की में न पिसें। अब निगाहें केंद्र सरकार पर हैं कि वह इस सुझाव को कानून का रूप देती है या नहीं।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव केवल कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का संकेत है। रोमियो-जूलियट क्लॉज लागू होता है तो पॉक्सो का उद्देश्य और प्रभाव दोनों अधिक स्पष्ट होंगे। इससे एक ओर बच्चों की सुरक्षा मजबूत होगी, तो दूसरी ओर किशोरों का भविष्य अनावश्यक आपराधिक ठप्पे से बचेगा। अब फैसला सरकार के हाथ में है—कानून कठोर ही रहे, या समझदार भी बने।

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