सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्यों चर्चा में आया रामायण का ‘कलनेमी’?

Published on: March 12, 2026

Supreme Court of India building symbolizing historic passive euthanasia verdict and discussion on Kalnemi reference from Ramayana.

देश की न्याय व्यवस्था में आए एक महत्वपूर्ण फैसले ने न केवल कानून और चिकित्सा नैतिकता की बहस को तेज किया है, बल्कि एक पुराने पौराणिक शब्द को भी अचानक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। लंबे समय से अचेत अवस्था में जी रहे एक युवक के मामले ने अदालत को कठिन निर्णय लेने पर मजबूर किया। फैसला सामने आते ही सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में “कलनेमी” शब्द तेजी से गूंजने लगा। आखिर यह शब्द क्यों सामने आया, इसका रामायण से क्या संबंध है और इच्छामृत्यु पर चल रही बहस से इसका जुड़ाव कैसे बन गया—यही सवाल लोगों की जिज्ञासा बढ़ा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद निवासी 32 वर्षीय हरीश राणा से जुड़े मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति देकर एक अहम कानूनी मिसाल स्थापित की है। अदालत की पीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल थे, ने लंबे समय से अचेत अवस्था में पड़े युवक की स्थिति और परिवार की अपील पर गंभीर विचार किया। दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से ऐसी स्थिति में हैं जहां वे न बोल सकते हैं और न ही सामान्य जीवन जी सकते हैं। परिवार ने अदालत से अनुरोध किया कि कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवन बनाए रखने के बजाय उन्हें प्राकृतिक मृत्यु का अवसर दिया जाए। इस फैसले ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और मानवीय गरिमा को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।


इच्छामृत्यु की अवधारणा और कानूनी संतुलन

इच्छामृत्यु का तात्पर्य उस परिस्थिति से है जब असाध्य बीमारी या असहनीय पीड़ा झेल रहे मरीज को जीवन रक्षक चिकित्सा को सीमित कर प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति दी जाती है। इसे दो प्रकारों में बांटा जाता है—सक्रिय और निष्क्रिय। भारत में लंबे समय तक अदालतों ने इस विषय पर अत्यंत सावधानी बरती, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन का अधिकार देता है। हालांकि समय के साथ न्यायपालिका ने यह भी स्वीकार किया कि गरिमा के साथ मृत्यु भी जीवन के अधिकार का हिस्सा हो सकती है। इसी दृष्टिकोण के चलते कुछ विशेष परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति देने की दिशा में न्यायिक सोच विकसित हुई है। हरीश राणा का मामला इसी विकसित हो रहे कानूनी दृष्टिकोण का ताजा उदाहरण बनकर सामने आया है।

रामायण का ‘कलनेमी’ और उसका प्रतीकात्मक अर्थ

इसी फैसले के बाद सार्वजनिक चर्चाओं में “कलनेमी” शब्द बार-बार सुनाई देने लगा है। रामायण की कथा के अनुसार कलनेमी एक राक्षस था जिसे रावण ने हनुमान को रोकने के लिए भेजा था। जब लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल हुए और हनुमान संजीवनी बूटी लेने हिमालय की ओर बढ़े, तब रावण को भय हुआ कि यदि औषधि पहुंच गई तो लक्ष्मण पुनर्जीवित हो जाएंगे। इसी कारण उसने कलनेमी को भेजा ताकि वह रास्ते में हनुमान को भ्रमित कर दे। कलनेमी ने साधु का वेश धारण कर छल से उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन अंततः उसकी सच्चाई सामने आ गई और हनुमान ने उसे परास्त कर दिया। इस कथा के कारण भारतीय समाज में “कलनेमी” शब्द छल और बाधा का प्रतीक बन गया।


आज के विमर्श में ‘कलनेमी’ का रूपक और आगे की राह

आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में “कलनेमी” शब्द का प्रयोग अक्सर रूपक के रूप में किया जाता है। जब कोई व्यक्ति या संस्था किसी सकारात्मक निर्णय या सुधार की राह में भ्रम फैलाकर बाधा डालती है, तो उसे प्रतीकात्मक रूप से “कलनेमी” कहा जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि इच्छामृत्यु पर चल रही बहस में भी यह शब्द इसी संदर्भ में सामने आया है। कुछ लोग इसे मानवीय निर्णय मानते हैं जो असहनीय पीड़ा से राहत दिलाता है, जबकि अन्य इसे नैतिक और धार्मिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण बताते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों में इच्छामृत्यु के कुछ रूप कानूनी हैं, लेकिन भारत में यह मुद्दा अभी भी गहन विचार और संतुलित दृष्टिकोण की मांग करता है।

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