Published on: January 25, 2026
कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पार्टी से लंबे समय तक जुड़े रहे एक वरिष्ठ नेता के बयान ने नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठन की कार्यशैली, फैसलों की प्रक्रिया और भविष्य की दिशा से जुड़े हैं। बयान के शब्द तीखे हैं और समय बेहद अहम। यह टिप्पणी ऐसे वक्त आई है, जब कांग्रेस पहले से ही राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है। सवाल यह है कि क्या यह महज नाराजगी है या पार्टी के भीतर गहरे संकट का संकेत?
नेतृत्व पर तीखा प्रहार: राहुल गांधी पर सीधे आरोप
कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद ने शनिवार को राहुल गांधी के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी एक डरपोक और असुरक्षित नेता हैं, जो संगठन के भीतर मजबूत और स्वतंत्र सोच रखने वाले नेताओं से असहज महसूस करते हैं। शकील अहमद का आरोप है कि पार्टी में उन्हीं युवा नेताओं को आगे बढ़ाया जा रहा है, जो हर फैसले पर नेतृत्व की प्रशंसा करते हैं और असहमति जताने से बचते हैं। उनके मुताबिक, जिन नेताओं की जनता में पकड़ और राजनीतिक हैसियत मजबूत है, उनसे दूरी बनाई जा रही है। इससे पार्टी का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो रहा है और निर्णय कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित होते जा रहे हैं।
तानाशाही प्रवृत्ति का आरोप और अमेठी की हार का जिक्र
शकील अहमद ने राहुल गांधी की कार्यशैली को गैर-लोकतांत्रिक और तानाशाही प्रवृत्ति वाली बताते हुए कहा कि वरिष्ठ नेताओं की राय को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी इस भ्रम में जी रहे हैं कि राष्ट्रीय पहचान के चलते कांग्रेस कभी राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं हो सकती। इसी क्रम में उन्होंने अमेठी से राहुल गांधी की चुनावी हार का जिक्र किया। अहमद के अनुसार, दशकों से परिवार की पहचान रही इस सीट का हाथ से निकलना केवल चुनावी गणित नहीं था, बल्कि नेतृत्व के व्यवहार और संगठन से दूरी का नतीजा था। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं और जनता से संवाद की कमी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया।
सोनिया गांधी से तुलना और संगठन पर पकड़ की बहस
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से तुलना करते हुए शकील अहमद ने कहा कि उन्होंने राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के दौर की कांग्रेस को एकजुट कर अपनी कांग्रेस बनाई। इसके उलट, राहुल गांधी सोनिया गांधी की कांग्रेस को भी पूरी तरह अपना नहीं सके। अहमद का कहना है कि जो नेता उनसे वरिष्ठ हैं या जिनका जनाधार मजबूत है, उनके सामने राहुल गांधी को ‘बॉस’ जैसा आत्मविश्वास महसूस नहीं होता। इसी असुरक्षा के चलते संगठन में नियंत्रण बढ़ता गया और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हुईं। उन्होंने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भी कहा कि जमीनी स्तर पर किसी बड़े नाम कटने की पुष्टि नहीं हुई है।
कौन हैं शकील अहमद और बयान के राजनीतिक मायने
शकील अहमद कांग्रेस के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। बिहार से ताल्लुक रखने वाले अहमद पेशे से डॉक्टर हैं और तीसरी पीढ़ी के राजनेता हैं। वे तीन बार विधायक और दो बार सांसद रह चुके हैं। इसके अलावा वे केंद्र सरकार में गृह, संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। वे AICC महासचिव और बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे अहम पद संभाल चुके हैं। पिछले साल नवंबर में उन्होंने स्थानीय नेतृत्व से मतभेदों का हवाला देते हुए कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे वरिष्ठ नेता के इस बयान को कांग्रेस के भीतर गहराते असंतोष और नेतृत्व संकट के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।