कैसे पड़ा ‘मोंथा’ नाम? जानिए समुद्री तूफानों के नामकरण की रोचक प्रक्रिया

Published on: October 29, 2025

कैसे पड़ा ‘मोंथा’ नाम? जानिए समुद्री तूफानों के नामकरण की रोचक प्रक्रिया

बंगाल की खाड़ी में उठा चक्रवाती तूफान ‘मोंथा’ अब एक गंभीर चक्रवात बन चुका है। इस नाम को लेकर लोगों में जिज्ञासा है कि आखिर “मोंथा” शब्द आया कहाँ से? दरअसल, इस चक्रवात का नाम थाईलैंड ने सुझाया था। समुद्री तूफानों के नामकरण की यह परंपरा नई नहीं है, बल्कि इसे साल 2000 में शुरू किया गया था ताकि हर चक्रवात को पहचानना आसान हो सके। इस प्रणाली में भारत समेत कई देश शामिल हैं, जो अपनी-अपनी सूची के अनुसार नाम सुझाते हैं। आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी।

तूफान ‘मोंथा’ की कहानी शुरू कहाँ से हुई

बंगाल की पश्चिम-मध्य खाड़ी में बना चक्रवात ‘मोंथा’ कुछ ही घंटों में ताकतवर बन गया और अब यह उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ते हुए एक भीषण चक्रवाती तूफान का रूप ले चुका है। मौसम विभाग के मुताबिक, यह तूफान मंगलवार सुबह साढ़े पाँच बजे तक “गंभीर चक्रवात” की श्रेणी में पहुँच गया। वर्तमान में इसका केंद्र आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम से लगभग 190 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व, काकीनाडा से 270 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और विशाखापट्टनम से करीब 340 किलोमीटर दक्षिण-दक्षिणपूर्व में स्थित है। इसके प्रभाव से आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और तेज़ हवाओं की संभावना जताई गई है।


कैसे पड़ा इस चक्रवात का नाम ‘मोंथा’?

अब सवाल उठता है — इस तूफान का नाम “मोंथा” आखिर किसने रखा? दरअसल, उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में आने वाले हर चक्रवात को उस क्षेत्र के देशों द्वारा तय की गई सूची के अनुसार नाम दिया जाता है। “मोंथा” नाम थाईलैंड ने सुझाया था। इस पैनल में भारत, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे कुल 13 देश शामिल हैं।
प्रत्येक देश पहले से कुछ नामों की सूची विश्व मौसम संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (ESCAP) को सौंपता है। जब नया चक्रवात बनता है, तो उस सूची में अगला नाम उसे दिया जाता है। इस तरह हर तूफान का एक अनोखा नाम होता है, जिससे लोगों तक जानकारी पहुँचाना और चेतावनी जारी करना आसान होता है।

 

कौन-कौन देश देते हैं चक्रवातों के नाम

साल 2000 में शुरू हुई इस प्रणाली के तहत एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों ने मिलकर चक्रवातों को नाम देने की परंपरा शुरू की। शुरुआती देशों में बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल थे। बाद में साल 2018 में इस सूची में ईरान, क़तर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और यमन को भी जोड़ा गया।
इन देशों द्वारा सुझाए गए नाम उनके देश की वर्णमाला के क्रम में सूचीबद्ध किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, सूची की शुरुआत बांग्लादेश से होती है, उसके बाद भारत, फिर ईरान, मालदीव, ओमान और पाकिस्तान आते हैं। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए जब किसी देश के नाम की बारी आती है, तो उसी देश द्वारा सुझाया गया नाम नए चक्रवात को दिया जाता है।


पुराने चक्रवातों के दिलचस्प नाम

अगर हम पिछले कुछ वर्षों के चक्रवातों पर नज़र डालें, तो “निवार”, “बुरेवी”, “तौकते”, “यास” और “गुलाब” जैसे नाम इसी प्रक्रिया से चुने गए थे। अप्रैल 2020 में सदस्य देशों ने एक नई सूची को मंजूरी दी थी, जिसमें आने वाले कई वर्षों के चक्रवातों के नाम पहले से तय कर दिए गए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि किसी नाम का दोबारा उपयोग नहीं किया जाता। यानी अगर कोई चक्रवात बहुत विनाशकारी साबित हो, तो उसका नाम सूची से हमेशा के लिए हटा दिया जाता है। इससे उस त्रासदी से जुड़ी यादें दोबारा न उभरें। इसी तरह हर नए चक्रवात को नई पहचान मिलती है, जो वैज्ञानिकों और मौसम विभागों के लिए डेटा और चेतावनी साझा करने में मदद करती है।


निष्कर्ष: नाम सिर्फ पहचान नहीं, चेतावनी का संकेत भी

‘मोंथा’ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है। जब किसी चक्रवात को नाम दिया जाता है, तो लोग उसे आसानी से याद रख पाते हैं, जिससे प्रशासन और जनता के बीच संवाद तेज़ हो जाता है। इस नामकरण प्रणाली ने आपदा प्रबंधन को काफी हद तक प्रभावी बनाया है।
अब जबकि ‘मोंथा’ तेजी से तट की ओर बढ़ रहा है, सभी की नज़रें इस पर टिकी हैं। तैयारी, सतर्कता और समय पर जानकारी ही इस प्राकृतिक चुनौती से निपटने का सबसे मजबूत उपाय है।

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