शाम 7 बजे बजता है सायरन, मोबाइल बंद, पढ़ाई चालू: भारत के इस गांव का अजीब-सा नियम

Published on: December 26, 2025

शाम 7 बजे बजता है सायरन, मोबाइल बंद, पढ़ाई चालू: भारत के इस गांव का अजीब-सा नियम

डिजिटल स्क्रीन की बढ़ती लत से जूझते बच्चों के लिए कर्नाटक के एक छोटे से गांव ने बड़ा और असरदार कदम उठाया है। यहां पढ़ाई के समय मोबाइल और टीवी पूरी तरह बंद रखने का सामूहिक फैसला लिया गया है। हर शाम सायरन बजता है और पूरा गांव ‘स्क्रीन ब्लैकआउट’ में चला जाता है। इस पहल का मकसद सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि परिवारों के बीच संवाद बढ़ाना भी है। क्या वाकई यह प्रयोग बच्चों का भविष्य बदल पाएगा? जवाब गांव की गलियों में छिपा है।


गांव से उठी पढ़ाई बचाने की पहल

कर्नाटक के बेलगावी जिले का हलगा गांव इन दिनों अपने एक सादे लेकिन असरदार फैसले की वजह से चर्चा में है। यहां की ग्राम पंचायत ने बच्चों की पढ़ाई सुधारने के लिए रोज शाम 7 से 9 बजे तक टीवी, मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन बंद रखने का निर्णय लिया है। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को मोबाइल की लत से दूर करना और पढ़ाई के लिए शांत माहौल तैयार करना है।

गांव में हर दिन ठीक शाम 7 बजे सायरन बजता है। यह संकेत होता है कि अब दो घंटे तक कोई भी स्क्रीन नहीं चलेगी। सायरन सुनते ही घरों में टीवी बंद कर दिए जाते हैं और मोबाइल फोन अलग रख दिए जाते हैं। इस समय का उपयोग बच्चे पढ़ाई में करते हैं और घर का माहौल भी पहले से ज्यादा शांत रहता है।


नियम नहीं, आपसी सहयोग का प्रयास

पंचायत ने साफ किया है कि यह कोई सख्त नियम नहीं है। न तो जुर्माना है और न ही सजा। यह पूरी तरह से गांव वालों के सहयोग पर आधारित है। पंचायत सदस्य और स्थानीय शिक्षक खुद घर-घर जाकर माता-पिता को इस पहल का महत्व समझा रहे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि इन दो घंटों में बच्चों के साथ बैठें और उनकी पढ़ाई में रुचि बढ़ाएं।

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महाराष्ट्र के गांव से मिली प्रेरणा

इस फैसले के पीछे प्रेरणा महाराष्ट्र के सांगली जिले के पास स्थित एक गांव से मिली है। वहां पहले इसी तरह का प्रयोग किया गया था, जिससे बच्चों के पढ़ाई के नतीजों में सुधार देखने को मिला। उसी अनुभव को देखकर हलगा गांव की पंचायत ने भी इसे अपनाया। पंचायत को उम्मीद है कि यहां भी इसके सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे।

हलगा गांव में कुल 1,452 घर हैं और लगभग सभी परिवार इस फैसले के साथ खड़े हैं। ग्राम पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी गजपति के अनुसार, गांव वालों ने बिना किसी दबाव के इस पहल को स्वीकार किया। ग्रामीण निंगप्पा कलिंगा का कहना है कि अब बच्चे समय पर किताबें खोलते हैं और परिवार के लोग भी एक-दूसरे से ज्यादा बात करने लगे हैं।


निष्कर्ष

हलगा गांव का यह फैसला दिखाता है कि बच्चों की पढ़ाई सुधारने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि सही सोच और सामूहिक प्रयास की जरूरत होती है। मोबाइल और टीवी से थोड़ी दूरी बनाकर गांव ने शिक्षा और पारिवारिक संवाद दोनों को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम उठाया है।

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