Published on: July 16, 2025
भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने Axiom-4 मिशन के तहत ISS पर एक अभूतपूर्व स्टेम सेल प्रयोग किया, जो कैंसर उपचार में क्रांति ला सकता है। माइक्रोग्रैविटी में स्टेम सेल्स के व्यवहार का अध्ययन करते हुए, उन्होंने पाया कि अंतरिक्ष में ये कोशिकाएँ तेजी से और अधिक प्रभावी ढंग से विकसित होती हैं। यह शोध CAR-T सेल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट जैसी उन्नत चिकित्सा पद्धतियों को गति प्रदान कर सकता है, जिससे कैंसर रोगियों के लिए नई आशा जागृत हो सकती है।
अंतरिक्ष में स्टेम सेल्स: कैंसर उपचार की दिशा में एक कदम
भारतीय वैज्ञानिक शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर किए गए अपने नवीनतम प्रयोग से चिकित्सा जगत को चौंका दिया है। Axiom-4 मिशन के तहत किए गए इस प्रयोग में स्टेम सेल्स पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभावों का विश्लेषण किया गया, जिसके परिणाम कैंसर जैसी जटिल बीमारियों के इलाज में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
स्टेम सेल्स को चिकित्सा विज्ञान में 'मास्टर सेल्स' माना जाता है, क्योंकि ये शरीर के किसी भी ऊतक या अंग में परिवर्तित हो सकती हैं। ये कोशिकाएँ घाव भरने, ऊतक पुनर्जनन और यहाँ तक कि कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालाँकि, धरती पर इन्हें प्रयोगशाला में विकसित करना एक बड़ी चुनौती है। गुरुत्वाकर्षण के कारण कोशिकाएँ एक-दूसरे से चिपक जाती हैं, जिससे उनकी वृद्धि और कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
माइक्रोग्रैविटी: स्टेम सेल्स के लिए आदर्श प्रयोगशाला
अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव नगण्य होता है, जिससे कोशिकाएँ स्वतंत्र रूप से विकसित हो पाती हैं। शुभांशु ने ISS की किबो लैबोरेटरी में लाइफ साइंसेज ग्लवबॉक्स का उपयोग करते हुए पाया कि माइक्रोग्रैविटी में स्टेम सेल्स तेजी से बढ़ती हैं और उनकी गुणवत्ता भी बेहतर होती है। यह खोज कैंसर उपचार के लिए उच्च-गुणवत्ता वाली स्टेम सेल्स के उत्पादन का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
शुभांशु के प्रयोग का मुख्य लक्ष्य यह समझना था कि अंतरिक्ष में स्टेम सेल्स कैसे व्यवहार करती हैं और क्या उन्हें कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने स्टेम सेल्स के साथ मांसपेशियों की कोशिकाओं (मायोजेनेसिस) का भी अध्ययन किया। विशेष पोषक तत्वों के साथ प्रयोग करते हुए, टीम ने जाँच की कि क्या इन कोशिकाओं को कैंसर विरोधी एजेंट के रूप में विकसित किया जा सकता है।

कैंसर उपचार में संभावित क्रांति
इस शोध के नतीजे कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में कई बड़े बदलाव ला सकते हैं:
स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में सुधार: ब्लड कैंसर (ल्यूकेमिया, लिम्फोमा) के इलाज में पहले से ही स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का उपयोग होता है। अंतरिक्ष में विकसित कोशिकाएँ इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना सकती हैं।
CAR-T सेल थेरेपी को बढ़ावा: इस तकनीक में रोगी की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को जेनेटिक रूप से संशोधित कर कैंसर से लड़ने के लिए तैयार किया जाता है। स्टेम सेल्स की बेहतर वृद्धि इस थेरेपी की सफलता दर बढ़ा सकती है।
ट्यूमर-लक्षित उपचार: यदि स्टेम सेल्स को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और नष्ट करने के लिए प्रोग्राम किया जा सके, तो यह कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करने में मददगार होगा।
क्यों यह निर्णय लिया गया?
अंतरिक्ष में स्टेम सेल शोध को प्राथमिकता देने के पीछे मुख्य कारण यह है कि माइक्रोग्रैविटी में कोशिकाएँ अधिक सटीक और तेजी से विकसित होती हैं। इससे पृथ्वी पर चल रहे शोधों को नई दिशा मिल सकती है। साथ ही, कैंसर जैसी बीमारियों के लिए नए उपचार विकसित करने की तात्कालिक आवश्यकता ने इस प्रयोग को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है।
इस तरह, शुभांशु शुक्ला का यह प्रयोग न केवल विज्ञान की दुनिया में एक नया अध्याय जोड़ता है, बल्कि लाखों कैंसर रोगियों के लिए आशा की एक नई किरण भी बन सकता है।
निष्कर्ष: भविष्य की ओर एक साहसिक कदम
शुभांशु शुक्ला का यह प्रयोग न केवल अंतरिक्ष अनुसंधान, बल्कि चिकित्सा विज्ञान में भी एक मिसाल कायम करता है। अगर अंतरिक्ष में विकसित स्टेम सेल्स धरती पर कैंसर रोगियों के इलाज में सफल साबित होती हैं, तो यह मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। NASA और ISRO जैसे संस्थान पहले से ही इस दिशा में शोध को गति दे रहे हैं, और शुभांशु का योगदान इस मुहिम को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।